लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले “कॉकरोच” नहीं होते।
वे लोकतंत्र की धड़कन होते हैं।
“क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध है?”
पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, बेरोज़गार युवाओं और जन-अधिकार रक्षकों की गरिमा पर हमला या व्यवस्था का भय?
— सरदार चरणजीत सिंह
सम्पादक, दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द हिन्दी समाचार पत्र
भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं होता।
लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ होता है — जनता की भागीदारी, जनता की आवाज़, जनता का सवाल पूछने का अधिकार, और सत्ता को जवाबदेह बनाने की व्यवस्था।
जब कोई पत्रकार भ्रष्टाचार उजागर करता है,
जब कोई RTI कार्यकर्ता सरकारी रिकॉर्ड मांगता है,
जब कोई बेरोज़गार युवा व्यवस्था की विफलताओं पर प्रश्न उठाता है,
जब कोई अधिवक्ता संविधान की रक्षा के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है,
तब वही लोकतंत्र जीवित रहता है।
लेकिन आज भारत के लोकतांत्रिक वातावरण में एक अत्यंत गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया है।
यदि वास्तव में देश के सर्वोच्च न्यायिक पद से यह टिप्पणी की गई कि कुछ बेरोज़गार युवा “कॉकरोच”, “परजीवी”, “मीडिया”, “RTI एक्टिविस्ट” बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं — तो यह केवल एक टिप्पणी नहीं है; यह लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर देने वाला प्रश्न है।
यह प्रश्न केवल शब्दों का नहीं है।
यह प्रश्न मानसिकता का है।
यह प्रश्न सत्ता और जनता के रिश्ते का है।
यह प्रश्न संविधान की आत्मा का है।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध क्या है?
क्या सवाल पूछना अपराध है?
क्या बेरोज़गार होना अपराध है?
क्या पत्रकार होना अपराध है?
क्या सूचना का अधिकार मांगना अपराध है?
क्या भ्रष्टाचार उजागर करना अपराध है?
यदि कोई युवा नौकरी न मिलने पर RTI लगाता है, पत्रकारिता करता है, सामाजिक आंदोलन में भाग लेता है, तो क्या वह लोकतंत्र का दुश्मन हो गया?
असल में लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध सवाल पूछना नहीं, बल्कि सवालों से डरना होता है।
भारत में सूचना का अधिकार आंदोलन ने करोड़ों लोगों को ताकत दी।
RTI ने:
राशन घोटाले उजागर किए,
फर्जी नियुक्तियाँ पकड़ीं,
सरकारी भ्रष्टाचार खोला,
अवैध ठेके उजागर किए,
फर्जी बिल पकड़े,
गरीबों का हक दिलाया।
सैकड़ों RTI कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई।
या वे लोकतंत्र के प्रहरी थे?
यदि RTI न होती, तो जनता को कैसे पता चलता:
किस सड़क का पैसा खाया गया,
किस अस्पताल में फर्जी खरीद हुई,
कौन सा पुल भ्रष्टाचार से गिरा,
किस विभाग में रिश्वतखोरी हुई?
RTI कार्यकर्ता लोकतंत्र की ऑक्सीजन हैं।
पत्रकारिता का अपमान पूरे लोकतंत्र का अपमान
पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाते हैं।
जनता और सत्ता के बीच पुल होता है,
सच सामने लाता है,
कमजोर की आवाज़ उठाता है,
संविधान की रक्षा में भूमिका निभाता है।
हाँ, यह भी सत्य है कि मीडिया का एक हिस्सा बिकाऊ, पक्षपाती या कॉरपोरेट प्रभाव में हो सकता है।
लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि पूरी पत्रकारिता को अपमानित कर दिया जाए?
यदि कुछ डॉक्टर भ्रष्ट हों तो क्या पूरी चिकित्सा व्यवस्था अपराधी हो जाती है?
यदि कुछ पुलिसकर्मी गलत हों तो क्या पूरी पुलिस व्यवस्था अपराधी हो जाती है?
फिर कुछ लोगों की वजह से पूरी पत्रकारिता और RTI आंदोलन को “कॉकरोच” कहना किस मानसिकता को दर्शाता है?
बेरोज़गार युवा आखिर जाएँ कहाँ?
भारत का युवा आज सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है।
पेपर लीक,
भर्ती घोटाले,
वर्षों तक परिणाम लंबित,
इंटरव्यू भ्रष्टाचार,
संविदा व्यवस्था,
निजीकरण,
बेरोज़गारी,
मानसिक तनाव,
आत्महत्या।
चाय बेच रहे हैं,
डिलीवरी कर रहे हैं,
रिक्शा चला रहे हैं,
प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्कर में उम्र खो रहे हैं।
YouTube चैनल शुरू करे,
पत्रकारिता करे,
RTI लगाए,
सोशल मीडिया पर सवाल पूछे,
PIL दायर करे,
तो क्या वह लोकतंत्र विरोधी हो गया?
असल में वह व्यवस्था की विफलताओं का जीवित प्रमाण बन जाता है।
सत्ता हमेशा सवालों से डरती है
तानाशाह हमेशा पत्रकारों से डरते हैं,
भ्रष्ट तंत्र हमेशा RTI से डरता है,
अन्यायी सत्ता हमेशा जागरूक युवाओं से डरती है।
ब्रिटिश राज भी यही कहता था:
जो सवाल पूछे वह देशद्रोही,
जो सच लिखे वह उपद्रवी,
जो जनता को जगाए वह खतरा।
आज भी व्यवस्था का एक हिस्सा वही मानसिकता लेकर चलता दिखाई देता है।
भारत का संविधान नागरिक को केवल वोट देने का अधिकार नहीं देता।
संविधान नागरिक को:
प्रश्न पूछने का अधिकार देता है,
सत्ता की आलोचना का अधिकार देता है,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है।
अनुच्छेद 19(1)(a) केवल बोलने का अधिकार नहीं है।
यह लोकतंत्र की आत्मा है।
यदि जनता सवाल नहीं पूछेगी, तो लोकतंत्र राजतंत्र बन जाएगा।
न्यायपालिका से अपेक्षा सबसे अधिक क्यों?
संसद से निराश हो सकती है,
सरकार से निराश हो सकती है,
प्रशासन से निराश हो सकती है,
लेकिन अंतिम उम्मीद न्यायपालिका से रखती है।
इसीलिए न्यायपालिका से भाषा, व्यवहार और संवैधानिक मर्यादा की अपेक्षा सबसे अधिक होती है।
जब सर्वोच्च न्यायिक पद से कठोर या अपमानजनक प्रतीत होने वाली भाषा आती है, तो उसका प्रभाव सामान्य व्यक्ति की तुलना में हजार गुना अधिक होता है।
क्योंकि शब्द केवल शब्द नहीं रहते — वे संस्थागत संदेश बन जाते हैं।
“कॉकरोच” शब्द का मनोवैज्ञानिक प्रभाव
इतिहास में जब भी किसी वर्ग को अमानवीय शब्दों से संबोधित किया गया:
हिंसा बढ़ी,
दमन बढ़ा,
सामाजिक नफरत बढ़ी।
किसी भी समूह को कीड़े-मकोड़ों या परजीवियों से तुलना करना अत्यंत संवेदनशील विषय माना जाता है।
लोकतांत्रिक समाज में असहमति रखने वालों को अमानवीय भाषा से संबोधित करना खतरनाक परंपरा बन सकती है।
क्या व्यवस्था आलोचना से ऊपर है?
भ्रष्टाचार उजागर करे,
सरकारी विफलताओं पर रिपोर्ट बनाए,
कोर्ट में PIL दायर करे,
प्रशासनिक लापरवाही सामने लाए,
तो क्या वह “सिस्टम पर हमला” कर रहा है?
असल में वही लोकतंत्र को मजबूत कर रहा होता है।
लोकतंत्र में “सिस्टम” जनता से ऊपर नहीं होता।
सिस्टम जनता की सेवा के लिए होता है।
क्या RTI कार्यकर्ता देश की समस्या हैं?
भ्रष्टाचार,
रिश्वत,
पेपर लीक,
राजनीतिक संरक्षण,
कॉरपोरेट कब्जा,
बेरोज़गारी,
न्याय में देरी,
ठेका प्रथा,
फर्जी भर्ती,
धनबल और बाहुबल
देश की असली समस्याएँ हैं?
यदि युवा सवाल पूछ रहे हैं, तो पहले यह पूछना चाहिए कि वे सवाल पूछने पर मजबूर क्यों हुए।
सोशल मीडिया ने जनता को आवाज़ दी
पहले बड़े मीडिया घरानों का एकाधिकार था।
अब सोशल मीडिया ने:
गरीब को आवाज़ दी,
छोटे पत्रकार को मंच दिया,
बेरोज़गार युवा को अवसर दिया,
भ्रष्टाचार उजागर करने का माध्यम दिया।
हाँ, सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ भी है।
लेकिन क्या समाधान पूरी जनता का अपमान है?
शिक्षा,
मीडिया साक्षरता,
पारदर्शिता,
जवाबदेही।
न्यायपालिका भी आलोचना से ऊपर नहीं
लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती।
संसद की आलोचना होती है,
सरकार की आलोचना होती है,
मीडिया की आलोचना होती है,
तो न्यायपालिका पर भी संवैधानिक और तथ्यात्मक आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है।
हाँ, आलोचना संयमित और तथ्यात्मक होनी चाहिए।
लेकिन आलोचना को “हमला” मान लेना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं।
जनता और व्यवस्था के बीच बढ़ती दूरी
आज भारत में आम नागरिक महसूस करता है कि:
उसकी सुनवाई नहीं होती,
उसकी नौकरी नहीं,
उसका भविष्य असुरक्षित,
उसका न्याय महंगा,
उसका सिस्टम पर भरोसा कमजोर हो रहा है।
ऐसे समय में संवैधानिक संस्थाओं का दायित्व और बढ़ जाता है कि वे:
सहानुभूति दिखाएँ,
सम्मानजनक भाषा अपनाएँ,
जनता का विश्वास मजबूत करें।
लोकतंत्र डर से नहीं चलता
आलोचना से मजबूत होता है,
सवालों से मजबूत होता है,
पारदर्शिता से मजबूत होता है।
जो व्यवस्था सवालों से डरती है, वह धीरे-धीरे जनता से कट जाती है।
पत्रकारों की सुरक्षा,
RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा,
बेरोज़गार युवाओं के सम्मान,
न्यायपालिका और जनता के बीच विश्वास,
संवैधानिक संवाद,
संस्थागत विनम्रता।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव
भारत यदि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाना चाहता है, तो उसे:
प्रेस स्वतंत्रता,
नागरिक अधिकार,
असहमति के अधिकार,
मानव गरिमा
के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहना होगा।
जब लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं को अपमानजनक भाषा में संबोधित किया जाता है, तो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी प्रश्न उठते हैं।
निष्कर्ष: लोकतंत्र का असली प्रहरी कौन?
वह पत्रकार है जो सच लिखता है,
वह RTI कार्यकर्ता है जो दस्तावेज़ मांगता है,
वह युवा है जो अन्याय पर सवाल उठाता है,
वह अधिवक्ता है जो संविधान की रक्षा करता है,
वह नागरिक है जो डरता नहीं।
यदि जनता सवाल पूछना बंद कर दे,
तो लोकतंत्र केवल इमारतों और कुर्सियों का नाम रह जाएगा।
भारत को डरने वाले नागरिक नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए।
भारत को चुप रहने वाले पत्रकार नहीं, निर्भीक पत्रकार चाहिए।
भारत को गुलाम मानसिकता नहीं, संवैधानिक चेतना चाहिए।
लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले “कॉकरोच” नहीं होते।
वे लोकतंत्र की धड़कन होते हैं।
— सरदार चरणजीत सिंह
सम्पादक
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