देश के वीरों की अनसुनी पुकार: 96 पूर्व सैनिकों की 24 साल की जंग, एनटीपीसी के दरवाजे पर धरना!
दैनिक रुस्तम-ए-हिन्द, नई दिल्ली, 26 दिसंबर 2025 (विशेष संवाददाता)
क्या आप जानते हैं कि वे सैनिक जो सीमा पर दुश्मन की गोलियां झेलकर देश की रक्षा करते हैं, आज खुद रोटी और न्याय के लिए सड़कों पर उतर आए हैं? जी हां, यह कहानी है उन 96 बहादुर पूर्व सैनिकों की, जो दाभोल पावर कंपनी (अब एनटीपीसी का हिस्सा) में 24 साल से ज्यादा समय तक सुरक्षा रक्षक के रूप में तैनात रहे, लेकिन उन्हें न वेतन मिला, न पेंशन, न ही कोई सम्मान! आज जब उनकी उम्र 60-70 पार हो चुकी है, वे दिल्ली के एनटीपीसी मुख्यालय के सामने धरने पर बैठे हैं, और पूछ रहे हैं – "क्या देश अपने रक्षकों को भूल गया?" लेकिन क्या हुआ जब प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई? कुछ सैनिकों ने भावुक होकर ऊपरी कपड़े उतार दिए, और पत्रकारों की आंखें भी नम हो गईं! आखिर यह मार्मिक दृश्य क्या छुपा रहा है? पढ़िए पूरी कहानी...
यह कोई फिल्मी ड्रामा नहीं, बल्कि हकीकत है जो बॉम्बे हाईकोर्ट के गलियारों से लेकर दिल्ली की सड़कों तक फैली हुई है। इन वीरों ने 2001 में कंपनी के एनटीपीसी में विलय के बाद स्थायी नौकरी की उम्मीद की थी, लेकिन मिला सिर्फ धोखा। उनके पास नियुक्ति पत्र, आईडी कार्ड और 178 दस्तावेजी सबूत हैं, फिर भी एनटीपीसी कहता है – "आप हमारे कर्मचारी नहीं!" क्या यह अन्याय नहीं है कि कारगिल की बर्फ में लड़ने वाले आज दवा और रोटी के लिए मोहताज हैं? सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा वायरल हो रहा है, जहां एक पोस्ट में इन सैनिकों की तस्वीरें और व्यथा साझा की गई हैं, जो दिल को छू लेती हैं।
मुंबई से विशेष रूप से दिल्ली पहुंचे पूर्व सैनिक लक्ष्मण महाडिक, सूर्यकांत पवार, आर.जी. पवार, व्ही.एस. साळुंखे, सुरेश पाचपुते, चंद्रकांत शिंदे और विजय निकम जैसे वीर अपनी व्यथा सुना रहे हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आज शुक्रवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन पूर्व सैनिकों ने 24 वर्षों से लंबित वेतन और पेंशन के मुद्दे पर सरकार और संबंधित संस्थानों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अब और इंतजार नहीं किया जाएगा और यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो वे अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू करेंगे। वरिष्ठ पूर्व सैनिकों ने मीडिया के सामने पूरे मामले से जुड़े दस्तावेज पेश किए और बताया कि वर्षों तक सेवा देने के बावजूद संबंधित संस्थानों ने न तो वेतन दिया और न ही पेंशन। इसका सीधा असर आज उनकी जिंदगी पर पड़ रहा है। कई पूर्व सैनिक बुजुर्ग हो चुके हैं और इलाज, भोजन व आवास जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पूर्व सैनिकों ने कहा कि “जय हिंद, जय जवान” उनके लिए केवल नारा नहीं, बल्कि पहचान है। लेकिन आज वही सैनिक अपने हक के लिए सड़कों पर आने को मजबूर हैं। वक्ताओं ने इसे सिस्टम की गंभीर विफलता बताया। प्रेस वार्ता के दौरान जब पत्रकारों ने लगातार सवाल किए, तो कई पूर्व सैनिक भावनात्मक हो गए। 24 वर्षों के इंतजार और लगातार संघर्ष की पीड़ा शब्दों में उतर आई। इसी भावनात्मक क्षण में कुछ पूर्व सैनिकों ने यह कहते हुए अपने ऊपरी कपड़े उतारकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया कि अब उनके पास खोने को कुछ नहीं बचा है। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि मौके पर मौजूद कई पत्रकार भी भावुक हो उठे और उनकी आंखें नम हो गईं। पत्रकारों ने एक स्वर में भरोसा दिलाया कि वे इस मुद्दे को दबने नहीं देंगे और पूर्व सैनिकों की यह आवाज देश-दुनिया तक पहुंचाएंगे। पूर्व सैनिकों ने यह भी बताया कि दाभोल/एनटीपीसी मुख्यालय के सामने प्रस्तावित कार्यक्रम में भी पत्रकारों ने उपस्थित रहने और आंदोलन को पूरा समर्थन देने का आश्वासन दिया है।
लक्ष्मण महाडिक ने कहा कि 24 साल किसी भी व्यक्ति के जीवन का बड़ा हिस्सा होते हैं। “हमने सेवा दी, लेकिन बदले में सिर्फ टालमटोल मिली। अब सब्र खत्म हो चुका है।” सूर्यकांत पवार ने कहा कि यह मामला भावनात्मक नहीं, बल्कि पूरी तरह दस्तावेजों पर आधारित है। “हमने आज सारे रिकॉर्ड मीडिया के सामने रख दिए हैं। अब जवाबदेही तय होनी चाहिए।” आर. जी. पवार ने सवाल उठाया कि देश के लिए काम करने वाले सैनिक आखिर किस हाल में पहुंच गए हैं। हर युद्ध जीतने वाले सैनिक आज रोटी, कपड़ा और दवा के लिए जूझ रहे हैं। वी. एस. सालुंखे ने साफ चेतावनी दी कि अब संघर्ष टालना संभव नहीं है। “हम सभी संवैधानिक रास्ते अपना चुके हैं। अब न्याय मिलेगा या आंदोलन तेज होगा।” सुरेश पचपुटे ने मीडिया से अपील की कि इस मुद्दे को दबने न दिया जाए। “अगर आज भी आवाज नहीं उठी, तो यह संदेश जाएगा कि सैनिकों के अधिकारों की कोई अहमियत नहीं है।” चंद्रकांत शिंदे ने कहा कि यह लड़ाई अब सिर्फ 96 लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि 96 परिवारों के भविष्य का सवाल बन चुकी है। वहीं विजय निकम ने आगे की रणनीति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि तुरंत कार्रवाई नहीं हुई, तो दाभोल/एनटीपीसी मुख्यालय के सामने अनिश्चितकालीन धरना दिया जाएगा।
आज सुबह 11 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक एनटीपीसी गेट पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुआ, जहां ये सैनिक अपनी वर्दी और मेडल दिखाकर अपील कर रहे थे। कल 27-28 दिसंबर को अनिश्चितकालीन धरना शुरू होगा। बॉम्बे हाईकोर्ट में इनकी 32 से ज्यादा रिट याचिकाएं लंबित हैं – चंद्रकांत अंटू शिंदे, तुलसीदास शंकरराव जिरंगे, विजय नारायण निकम जैसे नामों की फेहरिस्त लंबी है। अदालत ने कई बार सुनवाई टाली, लेकिन फैसला अब तक नहीं आया। क्या ये याचिकाएं कभी न्याय का दरवाजा खोलेंगी, या सैनिकों की आखिरी सांसें यूं ही निकल जाएंगी?
यह लड़ाई सिर्फ 96 सैनिकों की नहीं, पूरे देश के सम्मान की है। अगर आप भी सोच रहे हैं कि इन वीरों को न्याय कैसे मिलेगा, तो संपर्क करें: लक्ष्मण महाडिक (8652749991), सूर्यकांत पवार (8308376147) या संयोजक सरदार चरणजीत सिंह (9213247209)। क्या सरकार जागेगी, या यह अन्याय की कहानी यूं ही चलती रहेगी? पढ़ते रहिए रुस्तम-ए-हिन्द, जहां सच की आवाज कभी नहीं रुकती!




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