राजा राम और श्री कृष्ण पर गुरु गोबिंद सिंह की वीरता अति भारी।
राम उस समय के महाराजा दशरथ के पुत्र थे, चारों वेदों के ज्ञाता थे, सनातन मत को मानते थे, रघुकुल के लाल थे, आचायी-बुराई के भी जानकार थे।
क्या अच्छा है क्या बुरा है उसके भी ज्ञाता थे।
राम, लक्ष्मण गुरु वशिष्ट की शिक्षा के ज्ञाता अतिशक्तिशाली राजकुमार थे, युद्धकला में परवीन होने के साथ-साथ राजनीती के भी ज्ञाता थे।
फिर भी जानबूझ कर रावण की बहिन अति सुन्दर सुरुपनखा का नाक अति ज्ञानी रघुकुल के लाल राम की मौजूदगी में लक्ष्मण ने क्यों काटा ?
रावण, राम काल में सयंबर एक आम बात थी !
राम ने भी सीता स्वयम्बर में ही प्राप्त की थी।
सुरुपनखा भी उसी अधिकार के आधार पर लक्ष्मण से स्वयम्बर करना चाहती थी जो उसका अधिकार था।
लक्ष्मण ने यश-अपयश, परिणाम की परवाह किये बगैर सुरुपनखा जो उस समय के चारो वेदों के ज्ञाता अति शक्तिशाली महाराजा सनातन मत के रावण की बहिन थी उसीका का नाक काट दिया।
राम, रावण दोनों ही सनातन मत के जानकार, शिवजी महाराज को अपना इष्ट मैंने वाले बुद्धिमान राज परिवारों से थे।
जबकि सुरुपनखा ने भी राम-और लक्ष्मण को बताया भी था, कि वह रावण की बहिन है।
तो राम, रावण युद्ध का कारण क्या था ?
रावण भी चारों वेदों का ज्ञाता महाबली राजा था।
लंकापति रावण ने अपनी इकलौती बहिन सुरुपनखा के अपमान के कारण ही राम की पत्नी सीता का अपहरण किया, क्योंकि वह, अपने अपमान का बदला, राम-लक्ष्मण के अपमान से, लेना चाहता था।
अन्यथा राम, लक्ष्मण से वो युद्ध तब भी कर सकता था।
लेकिन उसने अपने अपमान का बदला राम-लक्ष्मण के अपमान से लिया।
अब वर्तमान समाज में भी दो शक्तिशाली लोग ऐसा ही करने की कोशश करते हैं।
उन्हें भी समाज और कानून का कोई भय नहीं।
समाज और कानून का भय थो साधारण व्यक्तियों को होता है।
और बुद्धिजीवियों की बात करें तो राम और रावण दोनों ही दोषी थे।
ना राम अपने भाई के साथ रावण की बहन सुरुपनखा की नाक काटते और ना ही रावण सीता का अपहरण करते।
इस बात का एक पहलु यह भी है कि दोनों चारों वेदों के ज्ञाताओं को एक दूसरे का अपमान करने के लिए स्त्रियों का ही अपमान करना उपयुक्त लगा।
यानी की दोनों की विचारधारा भी समान थी।
स्त्री के अपमान को दोनों ही अपना अधिकार मानते थे।
ये थी राम-रावण युद्ध का कारण और विष्लेषण।
अब हम महाभारत काल की बात भी कर लेते हैं।
महाभारत युद्ध भी स्त्रियों के अपमान के कारण ही हुआ।
कौरवों का राजा दुर्योधन ने भी द्रोणाचार्य से शिक्षा ली थी, पांच पांडवों ने भी द्रोणाचार्य से शिक्षा ली थी, कौरव भी सनातन मत के मानने वाले थे, पांडव भी सनातन मत को मानने वाले थे और चचेरे भाई भी थे।
सनातन धर्म को मानने वाले चारों वेदों के ज्ञाता पांडवों के राजा धर्मराज युधिष्ठिर ने यज्ञ के लिए सनातन धर्म को मानने वाले चारों वेदों के ज्ञाता कौरवों को हस्तिनापुर बुलाया था।
द्रोपदी पांचाल राज की राजकुमारी पांडवो की पटरानी चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला इत्यादी कलाओं की ज्ञाता थी।
उन्होंने जल में ऐसी कलाकृति बना राखी थी जो भूमि लगती थी और भूमि पर ऐसी कलाकृति बना राखी थी जो जल लगता था।
जिस पर दुर्योधन ने पैर रखा तो उसके पैरों पर रंग लग गया और आगे जाने पर जल था जो उसे दिखाई नहीं दिया और दुर्योधन पानी में गिर गया।
द्रोपदी अपनी सहेलियों और दासियों के साथ यह सब देख रही थीं।
दुर्योधन के जल में गिरने पर द्रोपदी ने दुर्योधन को बोल दिया अंधे का अँधा।
दुर्योधन का पिता नेत्रहीन ही था और द्रोपदी का ससुर भी था।
इस बात का महाबली दुर्योधन को अत्यंत क्रोध आया और उसने द्रोपदी से बदला लेने की ठान ली।
अपने राज्य में जाकर दुर्योधन अपने अपमान के कारण का बदला लेने के लिए धर्मराज युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए बुलाता है।
धर्मराज युधिष्ठिर जुआ खेलने का शौकीन है, धर्मराज युधिष्ठिर दुर्योधन के साथ जुआ खेलता है।
महाराजा धृतराष्ट्र की राज्य सभा में जहाँ महागयानियों, महाबलियों, महातपस्वियों, का जमघट लगा हुआ था कौरवों के युवराज दुर्योधन और पांडवों के राजा धर्मराज युधिष्ठिर के बीच जुआ खेलने के नियम बनाये गए थे।
पहले तो सभ्य समाज में जुआ खेलना ही एक अत्यंत निंदनीय अपराध है।
लेकिन महाराजा धृतराष्ट्र की राज्य सभा में धर्मराज युधिष्ठिर और युवराज दुर्योधन ने जुआ खेला था।
युवराज दुर्योधन अपने अपमान का बदला लेने के लिए जुआ खेल रहा था।
धर्मराज युधिष्ठिर को युवराज दुर्योधन ने एक दो बाजियां जितवा दी, जिससे धर्मराज युधिष्ठिर उत्साहित हो गया था।
धर्मराज युधिष्ठिर सबसे पहले युवराज दुर्योधन से अपने आभूषण और राज्य हारा, फिर अपने और अपने भाइयों के मुकुट हारा, फिर अपनी सेना हारा, फिर अपने चारों भाई और खुद को हारा, जब सभी कुछ हार कर जाने लगा तो दुर्योधन बोलै अभी तो एक वस्तु और है तुम्हारे पास !
धर्मराज युधिष्ठिर बोलै क्या है अब मेरे पास ?
दुर्योधन बोला तुम्हारी पत्नी द्रोपदी !
अब धर्मराज युधिष्ठिर और युवराज दुर्योधन दोनों देवी द्रोपदी को वस्तु मान रहे थे।
देवी द्रोपदी धर्मराज युधिष्ठिर और युवराज दुर्योधन के सनातनी विचारों में एक वस्तु थीं।
उस समस्य के सभ्य समाज में अति विशिस्ट राज कन्या, राजरानी एक वस्तु मानी जाती थीं।
देवी द्रोपदी को वस्तु मानकर धर्मराज युधिष्ठिर ने जुए पर दाव पर लगा दिया।
युवराज दुर्योधन इसी देवी द्रोपदी को जुए पर लगाने की प्रतीक्षा कर रहा था।
महाराजा धृतराष्ट्र की राज्य सभा में जहाँ महागयानियों, महाबलियों, महातपस्वियों, का जमघट लगा हुआ था धर्मराज युधिष्ठिर जुए में महादेवी देवी द्रोपदी को हार गया था।
दुर्योधन इसी अवसर की प्रतीक्षा में था।
दुर्योधन ने दुशासन को देवी द्रोपदी को बालों से घसीटकर राजयसभा में लाने का आदेश दिया।
महाराजा धृतराष्ट्र की राज्य सभा में जहाँ महागयानियों, महाबलियों, महातपस्वियों, की राजयसभा में दुशासन देवी द्रोपदी को बालों से घसीटकर लाया।
महाराजा धृतराष्ट्र की राज्य सभा जहाँ महागयानियों, महाबलियों, महातपस्वियों, की राजयसभा में देवी द्रोपदी का अपमान किया गया।
श्री कृष्ण ने देवी द्रोपदी की लाज बचायी।
इसी अपमान के कारण महाभारत का अति विनाशकारी युद्ध हुआ।
जिसमे असीमित धन-सम्पदा, बौद्धिक-सम्पदा, दैहिक-सम्पदा का अभूतपूर्व विनाश हुआ था।
राम-रावण युद्ध और महाभारत युद्ध दोनों अति विनाशकारी युद्ध स्त्रियों के अपमान का निजी बदला लेने और ज़मीन को प्राप्त करने के लिए हुए।
अब हम बात करते हैं आनंदपुर साहिब में गुरु गोबिंद सिंह साहिब के भूखे चालीस सिंघों के दस लाख की पहाड़ी राजाओं के युद्ध की।
जब गुरु गोबिंद सिंह साहिब ने समाज के हर वर्ग को शक्तिशाली बनाने के लिए मानव के सामाजिक अधकारों के प्रति जागरूकता लाने के लिए, समानता लाने के लिए, अधिकारों की आवाज़ उठाने में स्वाभिमानी होने के लिए आनंदपुर साहिब में अमृतपान करवाया तब सभी पहाड़ी राजा जिनके पूर्वजों को छठे गुरु श्री गुरु हरिगोबिन्द जी ने ग्वालिया के किले से जहांगीर के क़िले में बंदी होने पर, बंदी ग्रह से मुक्त करवाया था।
जो अपने आप को श्रेष्ठ समझते थे,सनातन धर्म को मानने वाले थे।
गुरु गोबिंद सिंह जी से पक्षपाती अमृतपान भी करना चाहते थे।
वो चाहते थे कि गुरु गोबिंद सिंह जी उन्हें अलग से अमृतपान करवाएं और आम जनता को अलग से।
इस भेदभाव पूर्ण पक्षपाती गलत बात को गुरु गोबिंद सिंह जी ने नकार दिया था, इसी लिए हिन्दू सनातनी पहाड़ी राजाओं ने मुस्लिम राजाओं को साथ लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी के चरों और घेरा दाल दिया, जो गुरु साहिब सारे समाज को समानता से प्रेम करते थे, जिनके लिए गुरु अर्जुन देव जी से लेकर गुरु तेगबहादुर सभी ने अपने सिखों और अपना बलिदान दिया, जो सभी के लिए लंगर लगते थे, सेवा करते थे उनका ही खाना-पानी बंद कर दिया, भूखे मजबूर गुरु परिवार और सिखों और कसमें खाकर कहा की आप यहाँ से चले जाओ आप पर कोई आक्रमण नहीं होगा, और पीछे से चालीस सिखों पर दस लाख की हरामखोर निर्लज्ज नमकहराम सनातनी फौज ने हमला कर दिया।
चालीस सिखों ने बाबा अजीत सिंह बाबा जुझार सिंह ने अभूतपूर्व युद्ध करते हुए वीरगति पायी, इस पर भी ये दुर्दांत वीभत्स अकर्मण्य कर्तव्यहीन लोगों ने दो छोटे साहिबजादे बाबा फ़तिह सिंह बाबा जोरावर सिंह जी को उनकी दादी मातार की सड़ी में पहले ठण्डे गुर्ज में यातनाएं दी, जो पांच और नो वर्ष के थे, जिनपर कानूनन कोई अपराध ना था, ना सिद्ध होता था, उन्हें अत्यंत घोर यातनाएं देकर ज़िंदा दीवारों में चिनवा कर शहीद किया।
फिर गुरु गोबिंद सिंह जी को धोखे से नांदेड़ में हत्यारों को भेज कर उनकी भी हत्या करवाई।
ये सभी कुछ अति अन्याय और कायरता पूर्ण अति घिनोना कुकृत्य किया पहाड़ी राजाओं और इस्लामिक आक्रांताओं ने।
गुरु गॉड सिंह जी से पहाड़ी राजाओं ने जज, जोरू, ज़मीन के लिए नहीं समाज की भलाई ना हो इस लिए युद्ध किया था।
अर्थात गुरु गोबिंद सिंह जी के समक्ष श्री राम और कृष्ण कही नहीं टिकते।
कहाँ जर, जोरू, ज़मीन के लिए युद्ध और कहाँ समाज के भले के लिए अपना बचाव करने के लिए युद्ध।
इस लिए गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके सिख उनका ख़ालसा सारे संसार में सर्वोपरी है, वो सर्वोपरी था, और वो खालसा सर्वोपरी रहेगा।
आज भी सारे संसार में खालसा समाज की सेवा और रक्षा के लिए संघर्षरत है और बाकी का समाज आज भी ज़र, जोरू, ज़मीन के लालच में ही फसा हुआ है।
जब तक संसार में खालसे का राज नहीं आता सारा संसार सदा की तरह दुखी ही रहेगा।
गुरु गोबिंद सिंह जी की किसी से कोई अनुपातिक समानता नहीं।
गुरु गोबिंद सिंह जी तीनो कालों, सभी दिशाओं, सभी दशाओं, सभी रंगों, सभी रसो, सभी द्वीपों, महाद्वीपों में सर्वोपरी थे, हैं रहेंगे।
और हमें पराम् गर्व है हम हिन्दू नहीं हम सनातनी भी नहीं हम सिख हैं हम खालसा हैं।
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